#मुसलमानों_की_बदहाली_की_वजह

 #मुसलमानों_की_बदहाली_की_वजह_बताता_एक_तारीखी_किस्सा_पढ़_कर_राय_दें:-


   तातारी ज़ालिम बादशाह हलाकू खान की बेटी जब बगदाद फतह के बाद शहर में घूम रही थी।उसने एक जगह लोगों की भीड़ नजर आने पर साथियों से पूछा- लोग यहां क्यों इकट्ठा है?साथियों ने बताया- ये लोग मुसलमान हैं और अपने आलिम के पास इकट्ठा हैं। हलाकू खान की बेटी ने उस आलिम को अपने पास बुलवा कर कुछ सवाल जवाब किये वो आप तक पहुंचा रहा हूं:-

*हलाकू की बेटी*-क्या तुम लोग अल्लाह पर ईमान नहीं रखते?

*आलिम*-यकीनन हम अल्लाह पर ईमान रखते हैं।

*हलाकू की बेटी*-क्या तुम्हारा ईमान ये है कि अल्लाह जिसे चाहे गालिब करता है?

*आलिम*-यकीनन हमारा इसी पर ईमान है।

*हलाकू की बेटी*-क्या अल्लाह ने आज हम तातरियों को तुम मुसलमानों पर गालिब नहीं कर दिया? 

*आलिम*-यकीनन कर दिया है। 

*हलाकू की बेटी*-क्या यह इस बात की दलील नहीं है कि अल्लाह हम तातारियों को तुमसे ज्यादा चाहता है?

*आलिम*-नहीं।

*हलाकू की बेटी*-साबित करो कैसे?

*आलिम*-क्या तुमने कभी भेड़ें चराने वाले चरवाहे को रेवड़ के साथ देखा है?

*हलाकू की बेटी*- हां देखा है। 

*आलिम*-चरवाहे ने रेवड़ के पीछे कुछ कुत्ते भी साथ रखे होते हैं?

*हलाकू की बेटी*- हां रखे होते हैं।  

*आलिम*-जब कुछ भेड़ें चरवाहे की कमान या रेवड़ को छोड़कर इधर-उधर निकल जायें और साथ आने तैयार ना हों तब चरवाहा क्या करता है?  

*हलाकू की बेटी*-चरवाहा उन भटकी हुई भेड़ों के पीछे अपने कुत्ते दौड़ा देता है।

*आलिम*-चरवाहा अपने कुत्ते कब तक उन भेड़ों के पीछे दौड़ाये रहता है?

*हलाकू की बेटी*- जब तक भटकी हुई भेड़ें इधर-उधर फरार रहें और फिर से रेवड़ या कमान में वापस ना आ जाएं।

*आलिम*- मेरे नज़दीक तुम तातारी भी जमीन में हम मुसलमानों के पीछे बुरे या ज़ालिम हाकिमों की शक्ल में अल्लाह के भेजे हुए उस चरवाहे के कुत्तों की तरह ही हो। जब तक मुसलमान अल्लाह और रसूल के बताये दीने इस्लाम की राह से भटके रहेंगे और बद आमाली छोड़ राहे रास्त पर वापस नहीं आएंगे तब तक अल्लाह तुम तातारियों को ज़ालिम हुक्मरानों की शक्ल में हम मुसलमानों के ऊपर या पीछे जीना हराम करने तैनात किए रहेगा।मेरा दावा है कि जिस दिन भी मुसलमान अल्लाह और रसूल के बताए दीने इस्लाम के सच्चे रास्ते पर चल कर अपने रेवड़ या तयशुदा दायरे में वापस आ जायेंगे उसी दिन तुम तातारियों का काम खत्म हो जायेगा!

 इसी ज़िम्न में शायर माजिद देवबंदी साहब ने लिखा है:-

आजिज़ी जब किसी इन्सान में आ जाती है,रब की ताईद भी पहचान में आ जाती है।

कर दिया जाता है ज़ालिम को मुसल्लत उस पर,गुमरही जब भी मुसलमान में आ जाती है।

 *अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने प्यारे हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सदके राहे मुस्तकीम से हटे तमाम मुसलमानों को जल्द अज़ जल्द हिदायत देकर ज़ालिम हाकिमों से निजात बख्शे।आमीन*

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